अरुणिमा
ज़िन्दगी की अरुणिमा में, साथ था जिस पल वो तेरा।
हर समय बस खिल-खिलाता, गात था कुसुमय सा मेरा।।
हर समय इक तरुणिमा सी, छाई उर अंतर थी मेरे।
मुस्कराहट में छिपी थी, खिल-खिलाहट सी ही मेरे।
हाथ था जिस पल तुम्हारा, हाथ कस लेता था मेरा।।
उर्मियों सी चमचमाती, देह कुन्दन सी तुम्हारी।
एक पल में सोख हर दुख, सुध को बिसराती हमारी।
सूर्यमुखी सा घूमता फिर, मन तेरी ही ओर मेरा।।
एक अल्हड़ सी जवानी, कसमसाती थी तुम्हारी।
मन के दर्पण में छिपी जो, छवि अनोखी सी तुम्हारी।
रूप यौवन मद-मदाता, अक्ष भर लेता था मेरा।।
ताल के विकसित कमल पर, वो तेरे दिल का लुभाना।
प्यार में भरकर तेरा फिर, रूठना-मनना, मनाना।
आज भी मन को लुभाता, ताल-तरंगित अक्स तेरा।।
सप्त अश्वी अरुण रथ पर, जा हुई आसीन जब से।
इन्द्र धनुषी ओढ़ चुनरी, सप्तरंगी हुई तब से।
आत्म ‘ज्योति’ को प्रकाशित, कर रहा अब प्रेम तेरा।।



















