महाराणा प्रताप
हल्दीघाटी के महावीर, शूरों के अप्रतिम शूरवीर।
वायु से वेगवान थे तुम गति जैसे कोई प्रलय का तीर।।
जो ठहर सके समरांगण में, ऐसा ना मिला सूर कोई।
जब थे तुमने खोले लोचन, अवनी निर्भय हो शांत सोई।
तुम्हारी छाती बेध सके, ऐसा ना बना था कोई तीर।
हल्दीघाटी के महावीर, शूरों के अप्रतिम शूरवीर।।
राणा प्रताप सा भीषण रण,लड़ा ना आज तक कोई है।
वंशजों के रक्त की कुछ बूंदें, दुश्मन के लहू से धोई हैं।
जिसने उनको ललकारा,उसका ही दिया कलेजा चीर।
हल्दीघाटी के महावीर, शूरों के अप्रतिम शूरवीर।।
जितने संकट राणा ने सहे, सहा ना आज तक कोई है।
उनकी कुर्बानी देख देख, ममता भी आंसू रोइ है।
दासता न स्वीकार करी, सही कठिन से कठिन पीर।
हल्दीघाटी के महावीर, शूरों के अप्रतिम शूरवीर।।
जहां पहुंचते थे राणा, टिकता ना था कोई वहां वीर।
अकबर का हृदय वेध गया, उनके पौरुष का दिव्य तीर।
दुश्मन को नाकों चने चबवा, सिंहों की भांति मरा वीर।
हल्दीघाटी के महावीर, शूरों के अप्रतिम शूरवीर।।
भारत माता की ‘ज्योति’ का, संपूर्ण विश्व यश गाता है।
उनकी पावन स्मृति में, झुक शीश स्वयं ही जाता है।
राणाप्रताप का वह चेतक,उड़ गया अनंत हवा को चीर।
हल्दीघाटी के महावीर, शूरों के अप्रतिम शूरवीर।।



















