संदोह

अल्पता से स्वल्पता तक आ गया हूं।अल्पना से कल्पना तन छा गया हूं।अब बीतते हैं रात दिन सब रीते रीते।हर सांस में कुछ तरह समा गया हूं।। झाड़ियों को पा मिला सुकून मुझको।नागफनियों ने डसा था खूब मुझको। हैअब नहीं शिकायत मुझे किसी बात की है।रक्त से अपनों ने नहलाया … Read More

चार दिन की ज़िंदगानी

जब जिंदगानी चार दिन की रह गई।किस लिए अब फासले मिटाते हो।।रहने दो दीवार अब यूं ही खड़ी।किस लिए इसे आप अब गिराते हो।।एक ये ही तो बनी पहचान है।प्यार की अविरल हमारे आपके।।रहने दो इसको खड़ी हूं ही सदा।किसलिए बेवक्त ही गिराते हो।।इस पे हैं दोनों तरफ लिक्खी गई।प्यार … Read More